Thursday, May 15, 2014

शिव पुराण की उमा संहिता में दिए गए काल को जीतने के उपाय

नवधा शब्दब्रह्म एव तुंकार

भगवान शिव माँ पार्वती जी को बताते हैं- रात में जब सब सो जाये अंधकार में योग धारण करे| तर्जनी उंगली से दोनों कानो को बंद करके दो घडी तक दबाए रखे| इस अवस्था में अग्नि प्रेरित शब्द सुनाई देता हैं| योगाभ्यास द्वारा सुनने के प्रयत्न पर भी जब योगी इस शब्द को नहीं सुन पाता, तब भी वह दिन रात अभ्यास में लगा रहे| ऐसा करने से सात दिन में वह शब्द प्रकट होता हैं, जो मृत्यु को जीतने वाला हैं|
यह शब्दब्रह्म न ओंकार हैं, न मन्त्र हैं, न बीज हैं, न अक्षर हैं| यह अनाहत (बिना आघात के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) हैं| इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता हैं| इस शब्द- जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता हैं को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से छूट जाता हैं| तदन्तर योगियों द्वारा प्रतिदिन इस शब्द के चिंतन करने से यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता हैं|

शब्दब्रह्म नो प्रकार के हैं
  1. घोष- सबसे पहले घोषात्मक नाद प्रकट होता हैं, जो आत्म शुद्धि का उत्तम साधन हैं| यह उत्तम नाद सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत कर अपनी ओर खीचने वाला हैं|
  2. कास्य नाद- दूसरा नाद कास्य नाद हैं, जो प्राणियों की गति को स्थम्भित करता हैं| यह विष, भूत, और ग्रह आदि सबको को बांधता हैं|
  3. श्रृंग नाद- यह अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला हैं|
  4. घंटा नाद- चौथा नाद घंटा नाद हैं जिसका उच्चारण साक्षात् शिव करते हैं| यह नाद सम्पूर्ण देवताओं को भी आकृष्ट कर लेता हैं, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात  ही क्या हैं|
  5. वीणा- पांचवा नाद वीणा नाद हैं जिससे दूरदर्शन की शक्ति प्राप्त होती हैं|
  6. वंशी नाद- इस नाद का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता हैं|
  7. दुन्दुभी नाद- इस नाद का चिंतन करने वाला साधक ज़रा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता हैं|
  8. शंख नाद- शंख नाद का अनुसन्धान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती हैं|
  9. मेघ नाद- के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता |

भगवान शिव कहते हैं कि इन नो शब्दों के चिंतन से बढ़कर कर तुंकार का अभ्यास हैं | शिव पार्वति माँ को बताते हैं कि प्रतिदिन एकाग्रचित से ब्रह्मरुपी तुंकार का ध्यान करते हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं होता हैं| उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं| वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होकर सर्वत्र विचरण करता हैं, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता| वह साक्षात शिव ही हैं, इसमें संशय नहीं हैं|
             

 हर....हर ....महादेव!!!!!  हर ..हर ...महादेव!!!!!!!!!! 

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