Wednesday, May 14, 2014

दुनिया का अस्तित्व एक रहस्य हैं?

डा. सुशील भाटी 

दुनिया का अस्तित्व एक रहस्य हैं? दुनिया क्या हैं? जीवन क्या हैं? इस जीवन के पहले क्या था और बाद में क्या होगा? इस अनंत ब्रह्माण्ड का क्या कोई ओर-छोर हैं या नहीं? यदि कोई छोर हैं तो उसके बाद क्या हैं? इस ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में आने से पहले क्या था और यदि कभी इसका अंत हुआ तो इसके स्थान पर क्या होगा?

दुनिया में ज़न्मे कुछ लोग सहज रूप से ही दुनिया के इस रहस्य की ओर आकर्षित होते हैं| वो पूर्ण सत्य को जानने के लिए जिज्ञासु रहते हैं| ऐसे मनुष्य वास्तविक अध्यात्मिक व्यक्ति होते हैं| ये जीवन-पर्यंत सत्य का अनुष्ठान करते हैं| ध्रुव, प्रह्लाद, नचिकेता, संत ज्ञानेश्वर, स्वामी विवेकानंद आदि साधु-संत ऐसे ही सत्य प्रेमी हैं| अपनी सत्य निष्ठा के कारण प्राकृतिक-सामाजिक वैज्ञानिक अक्सर आध्यात्म के निकट होते हैं, जैसे- प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन| विज्ञानं ओर आध्यात्म में कोई विरोधाभास नहीं हैं, बल्कि आध्यात्म अक्सर विज्ञानं के लिए कुछ अग्रिम संकल्पनाए प्रस्तुत करता हैं, जिनकी पुष्ठी कई बार विज्ञानं अपने शोध द्वारा करता हैं|

आम आदमी आनंद की खोज में रोज-मर्रा के जनजीवन में उलझा रहता हैं ओर उसका ध्यान बहुधा दुनिया के इस रहस्य की तरफ नहीं जाता| दुनिया के दुःख-कष्ट कई बार रोज-मर्रा के जीवन से उसका मोह भंग कर देते हैं ओर कुछ पलों के लिए वह दुनिया ओर जीवन पर पुनर्विचार करता हैं ओर रहस्य के परे पूर्ण सत्य की तरफ आकर्षित होता हैं| ऐसा करके वह दुखो से मुक्त महसूस करता हैं| किसी प्रिय की मौत, सबसे बड़े दुखो में से एक हैं| अतः शमशान में अक्सर ऐसे अनुभव होते हैं| दुनिया के प्रमुख धर्म- हिंदू, इस्लाम, सिक्ख, ईसाई आदि ईश्वर ओर उसकी सत्ता को पूर्ण सत्य मानते हैं| अतः कष्ट ओर दुःख के समय मानव ईश्वर को याद करता हैं| लेकिन दुनिया के सभी धर्म ईश्वरीय सत्ता को नहीं स्वीकारते, जैसे बौद्ध धर्म| बौद्ध धर्म का ज़न्म ही मानव के दुःख निरोध के लिए हुआ हैं| बौद्ध धर्म ने दुःख निरोध के लिए आस्टान्गिक मार्ग बताया हैं, जिसमे चरम पर समाधी हैं|

चाहे मनुष्य सहज जिज्ञासु हो अथवा उसका मकसद दुःख-निरोद्ध हो सत्य की खोज के मार्ग पर चलना ओर सत्य का अनुभव करना आसान कार्य नहीं हैं| जिसके प्रमुख रूप से दो कारण हैं| पहला कारण यह हैं कि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की सीमाएँ हैं| आंखें प्रकाश की एक सीमा के अंदर ही देख सकती हैं| कान 20 से 20000 हर्ट्ज (Hz) तक की आवाज़ को ही सुन सकते हैं| इसी प्रकार मनुष्य के सूघने, चखने और छू  कर महसूस करने की अपनी सीमाए हैं| इसीलिए मनुष्य की सभी परिकल्पनाए, विचार और उसका सारा ज्ञान-विज्ञानं अर्ध सत्य और सीमित हैं और पूर्ण सत्य इन सीमाओ के बाहर हैं|

दूसरा कारण यह हैं की मनुष्य दुनिया की हर चीज़ को अपनी मूलभूत आवश्कताओ (Basic needs) की पूर्ती के लिए देखता-समझता हैं| भूख, प्यास, सेक्स, शरीर का मौसम से बचाव और जीवन की सुरक्षा आदि उसकी मूलभूत आवश्कता हैं| दूसरे शब्दों मनुष्य रोटी, कपडा और मकान के सन्दर्भ में ही दुनिया को देखता-समझता हैं| वह प्रकृति को उसके वास्तविक रूप में नहीं देखता बल्कि उसमे अपने भोग की वस्तुओ को ही तलाशता हैं|  मसलन मनुष्य को किसी झाडी में, उसका वास्तविक स्वरुप कम, बल्कि उसे पुशुओ का चारा या चूल्हे का ईधन अधिक दिखाई देता हैं|

प्रश्न उठता हैं कि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियो की सीमाओ ओर रोज-मर्रा के भोग-विलासो में उलझे हुए उसके मन के बावजूद, क्या पूर्ण सत्य को जाना जा सकता हैं या नहीं?

हिन्दुस्तान में सत्य को जानने के लिए ध्यान ओर समाधी का मार्ग अति प्राचीन काल से प्रचलित हैं| हिंदू, बौद्ध, जैन आदि सभी ध्यान ओर समाधी की अवस्था में सत्य के साक्षात्कार ओर आनंद प्राप्ति की बात करते हैं| मनुष्य इस मार्ग पर अपने को समर्पित कर सके इसके लिए सभी हिन्दुस्तानी मूल के धर्म भोग-विलासो पर नियंत्रण और अनुशासित जीवन की बात भी करते हैं|

ध्यान और समाधी के मार्ग की सत्यता और अधिकारिता, इस मार्ग पर चल कर ही पता चल सकती हैं? समुन्द्र के किनारे बैठ कर उसकी उसकी हकीकत नहीं जानी जा सकती| उसे जानने के लिए तो समुन्द्र में छलांग लगानी ही पड़ेगी|

                                                                                                        - Dr. Sushil Bhati

1 comment:

  1. Bahut hi achchcha aalekh... Sahi Likha...ध्यान और समाधी के मार्ग की सत्यता और अधिकारिता, इस मार्ग पर चल कर ही पता चल सकती हैं? समुन्द्र के किनारे बैठ कर उसकी उसकी हकीकत नहीं जानी जा सकती| उसे जानने के लिए तो समुन्द्र में छलांग लगानी ही पड़ेगी|

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