Thursday, May 15, 2014

शिव पुराण की उमा संहिता में मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए बताई गयी चार योगिक साधनाए


1. प्राणायाम- भगवान शिव माँ पार्वती को मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए  चार योगिक साधनाओ के बारे में बताते हुए, सबसे पहले, वे प्राणायाम का महत्व समझाते हैं| वे कहते हैं कि साधक जरा और मृत्यु को जीतने कि इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे, क्योकि योगपरायण योगी को भली-भाति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिए| जैसे लुहार मुख से धोकनी को फूक-फूक कर, वायु के द्वारा अपने सब कार्यों को सिद्ध करता हैं, उसी प्रकार योगी को अपने कार्य सिद्धि के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए| प्राणयाम के समय जिन परमेश्वर का ध्यान किया जाता हैं वे समस्त ग्रंथियो को आवृत करके उनसे दस अंगुल आगे स्थित हैं| आदि में व्याह्व्ती और अंत में शिरो मन्त्र सहित गायत्री का तीन बार जप करे और प्राण वायु को रोके रहे| प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम हैं|

2. भ्रूमध्य में अग्नि का ध्यान- भगवान शिव माँ पार्वती को यह बताने के बाद कि योगी किस प्रकार वायु (प्राणायाम) से सिद्धि प्राप्त करता हैं, आगे बताते हैं कि योगी किस प्रकार तेज से सिद्धि लाभ करता हैं| भगवान शिव कहते हैं कि जहा दूसरे लोगो की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत-एकांत स्थान में अपने सुखद आसान पर बैठकर, वाम और दक्षिण नेत्र की कांति से प्रकाशित भ्रूमध्य भाग में, जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप प्रकाशित होता हैं, उसे आलस्यरहित योगी दीपकरहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिंतन करने पर निश्चय ही देख सकता हैं- इसमें संशय नहीं हैं| योगी हाथ कि उंगलियों से यत्नपूर्वक दोनों नेत्रो को कुछ-कुछ दबाए रखे और उनके तारों को देखता हुआ, एकाग्रचित से आधे मुहुर्त तक उन्ही का चिंतन करे| तदन्तर अन्धकार में भी ध्यान करने पर वह इस ईश्वरीय प्रकाश को देख सकता हैं| यह ज्योति सफ़ेद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के सामान रंगवाली होती हैं| जो अन्धकार से परे और सूर्य के सामान तेजस्वी हैं, उसी महान ज्योतिर्मय पुरुष (परमात्मा) को जानकार मनुष्य काल या मृत्यु को लांघ जाता हैं| मोक्ष के लिए इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं हैं|

3. मुख से वायुपान- भगवान शिव माँ पार्वती को आगे बताते हैं कि योगी अपने चित को वश में करके, यथायोग्य स्थान में सुखद आसान पर बैठे| वह शरीर को ऊँचा करके, अंजलि बांधकर चोंच जैसी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करे| ऐसा करने से एक पल में तालू के भीतर स्थित जीवनदायी जल कि बूंदे टपकने लगती हैं| उन बूंदों को वायु के द्वारा लेकर सूंघे| वह शीतल जल अमृत स्वरुप हैं| जो योगी प्रतिदिन उसे पीता हैं, वह कभी मृत्यु के अधीन नहीं होता| उसे भूख-प्यास नहीं लगती| उसका शरीर दिव्य और तेज महान हो जाता हैं| वह बल में हाथी और वेग में घोड़े की समानता करता हैं| उसकी दृष्टि गरुड़ के सामान तेज हो जाती हैं और उसे दूर कि बाते सुनाई देने लगती हैं| उसके केश काले-काले और घुंघराले हो जाते हैं|

4. जिव्हा द्वारा गले घाटी का स्पर्श- भगवान शिव आगे बताते हैं कि योगी पुरुष अपनी जिव्हा को मोड कर तालू में लगाने का प्रयत्न करे| कुछ काल तक ऐसा करने से यह क्रमश लंबी होकर गले कि घाटी तक पहुच जाती हैं| तदन्तर जब जिव्हा गले की घाटी से सटती हैं, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती हैं| उस सुधा को जो योगी सदा पीता हैं, वह अमरत्व को प्राप्त होता हैं|


हर हर महादेव !!!  हर हर महादेव !!!!!!   हर हर  महादेव !!!!!!!!!!!

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