Thursday, June 26, 2014

ध्यान और समाधी का मार्ग: ऐतिहासिक परिपेक्ष्य

डा.सुशील भाटी

भारत प्रागैतिहासिक काल से साधु,सन्यासियों, संतो एवं श्रमणों का देश रहा हैं| साधु-सन्यासी यहाँ अध्यात्मिक उद्देश्य से ध्यान और समाधी में रत रहते हैं| ध्यान और समाधी के मार्ग पर चलने वाले लोग, आस्तिक और नास्तिक, दोनों प्रकार के रहे हैं| ईश्वर को नहीं मानने वाले के लिए ध्यान और समाधी सत्य को जानने का तथा ईश्वर को मानने वाले के लिए यह ईश्वर से मिलन का मार्ग रहा हैं| ध्यान और समाधी के मार्ग का अंतिम अध्यात्मिक लक्ष्य जीवन मरण के चक्र से मुक्ति रहा हैं| हिंदू ग्रंथो में इसे मोक्ष, बौद्ध ग्रंथो में निर्वाण और जैन ग्रंथो में कैवल्य कहा गया हैं|

सिंधु घाटी की सभ्यता (2300-1750 ईसा पूर्व) से सम्बंधित मोहनजोदड़ो नामक स्थल से प्राप्त ध्यानस्त व्यक्ति के चित्र वाली मोहर ध्यान और समाधी के अध्यात्मिक मार्ग का प्राचीनतम प्रमाण हैं| इतिहासकारों ने इस मोहर में दर्शाये गए ध्यानस्थ व्यक्ति को आध्-शिव (Proto-Shiva) कहा हैं| मोहनजोदड़ो की खुदाई से एक विशाल स्नानागार भी प्राप्त हुआ हैं, जिसके चारो तरफ दो मजिले कमरे भी बने थे| इतिहासकारों का मत हैं कि संभवतः नीचे के कक्ष में स्नान कर व्यक्ति ऊपर के कक्ष में जाकर ध्यान करता था| अतः ध्यान और समाधी का अध्यात्मिक मार्ग मूल रूप से आर्यो के आगमन (1500 ईसा पूर्व) से पूर्व की एक शैव परम्परा हैं जो प्रागैतिहासिक काल से भारत भूमि में प्रचलित हैं|

ऋग्वेद से ज्ञात होता हैं कि आरम्भ में आर्यो प्रकृति के भिन्न रूपों के उपासक थे| इंद्र, वरुण, अग्नि आदि उनके प्रमुख देवता थे| अपने देवताओ को प्रसन्न करने के लिए आर्य उनका स्तुतिगान एवं यज्ञ करते थे| आर्य देवताओ से, जीवन में भौतिक सुख-समृधि एवं संतान प्राप्ति की तथा मृत्यु के बाद स्वर्ग की कामना करते थे| जीवन- मरण के चक्र से मुक्ति अथवा मोक्ष की कामना वो नहीं करते थे| 

ऋग्वेदिक काल (1500-1000 ईसा पूर्व) में आर्यो का अपने  सप्त-सिंधु निवास क्षेत्र में अनेक अनार्य कबीलो से युद्ध हुआ| ऋग्वेद से पता चलता हैं कि सिंधु नदी के पश्चिम क्षेत्र में पांच अनार्य जन समूह थे, जो आर्यो के आगमन से बहुत पहले से रह रहे थे| इनके नाम अनिल (आधुनिक कफिरिस्तान), पक्थ (आधुनिक पख्तून), भलान (बोलन दर्रे के निवासी), शिव (सिंधु के निकट रहने वाले लोग) तथा विषाणिन् थे| अज, यक्ष्, किकट, पिशाच, शिश्नु, आदि अन्य अनार्य कबीले हैं जिनके ज़िक्र ऋग्वेद में मिलता हैं| इन अनार्य कबीलो के नाम से प्रतीत होता हैं कि ये अधिकांश शिव के उपासक थे| शिव नामक अनार्य कबीला शिव का समर्थक रहा होगा| इस बात की भी प्रबल सम्भावना हैं कि शिव एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं, जिनका ज़न्म इस शिव नामक कबीले में हुआ हो| शिव के विवाह की कथाओ और प्राचीन शैव साहित्य में उनके पारावारिक जीवन के वर्णन से, वे धरती पर ज़न्म लेने वाले एक वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति प्रतीत होते हैं| शिश्नु  संभवतः, जैसा कि उनके नाम से विदित होता शिव की शिश्न अर्थात लिंग रूप में पूजा करते थे| शिवलिंग पूजा की परंपरा आज भी हिंदू समाज में प्रचलित हैं| प्राचीन शैव साहित्य से स्पष्ट होता हैं कि शिव की बारात में पिशाच भी सम्मलित थे, जोकि संभवतः शिव समर्थक पिशाच कबीले के लोग थे| गीता के अनुसार कृष्ण का ज़न्म विष्णी कुल में हुआ था, जोकि विषाणिन् से साम्य रखता हैं| भारत में शिव योग की प्रतिमूर्ति हैं तो गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण योग के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं| कृष्ण को मोक्षदाता कहा जाता हैं और योगेश्वर के रूप में उनकी ख्याति हैं| कृष्ण शिव भक्त थे, वे कहते थे कि वो शिव के कार्य को ही आगे बढ़ा रहे हैं|  

हिंदू आस्था के अनुसार शिव संहारक हैं, वे शमशान के देवता माने जाते हैं| उन्हें महाकाल भी कहा जाता हैं, उज्जैन में उनका प्रसिद्ध महाकाल मंदिर हैं| मृत्यु पर विजय के लिए, महामृत्युंजय मन्त्र के ज़प के माध्यम से, शिव की आराधना कर उनकी कृपा प्राप्ति की कामना की जाती हैं| हिंदू आस्था के अनुसार शिव अमरत्व प्रदान करने वाले हैं और अमरनाथ कहलाते हैं| बाबा अमरनाथ के नाम से मशहूर गुफा हैं ज़हा बर्फ का बना शिव लिंग हैं| शिव पुराण की उमा संहिता में मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए चार योगिक साधनाए बताई गई हैं- प्राणायाम, भ्रूमध्य में अग्नि का ध्यान, मुख से वायुपान, तथा जिव्हा द्वारा गले घाटी का स्पर्श| ऐसा प्रतीत होता हैं कि आरंभ में ध्यान और समाधी के मार्ग का लक्ष्य मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करना था|

उत्तर वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व) में आर्यो का विस्तार उत्तर भारत में हुआ तथा यह क्षेत्र आर्यो के वर्चस्व के कारण आर्यवृत कहलाने लगा| इस बीच उनका अनार्य कबीलो के साथ संपर्क काफी बढ़ गया| आर्यो-अनार्यों के परस्पर संपर्क और समिश्रण के प्रभाव के कारण उत्तर वैदिक आर्यो के धार्मिक विश्वासों में देवताओ की त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) का उदय हुआ| 

उत्तर वैदिक काल में जन्मी वर्ण-आश्रम धर्म व्यवस्था भी आर्य और अनार्यों की परम्पराओ के समिश्रण का ही प्रभाव हैं| संभवतः व्यवसाय और संस्कृति विभेद पर आधारित सामाजिक वर्गीकरण सिंधु सभ्यता में प्रचलित था| इसी से प्रेरणा प्राप्त कर आर्यो ने सांस्कृतिक रूप से भिन्न श्याम वर्ण के समुदायों के बीच अपना वर्चस्व कायम करने के लिए वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया| वर्ण व्यवस्था की प्रेरणा भारतीय हैं, यह इस बात से भी साबित होता कि भारत के बाहर ईरानी, मध्य एशियाई और यूरोपीय आर्यो समुदायों में कभी भी यह देखने-सुनने में नहीं आई| उत्तर वैदिक काल में आर्यो और अनार्य कबीलो के पुरोहित, यौद्धा, व्यापारी वर्गों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ण बने| अनार्यों के साधारण वर्ग से शूद्र वर्ण के अंतर्गत रखा गया| ऋग्वेद में अनार्यों समुदायों और वर्गों को दास तथा दस्यु कहा गया हैं| कालांतर में ब्राह्मण साहित्य में शूद्रो की उपाधि दास बताई गई हैं| 

उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण यजुर्वेद और ब्राह्मण ग्रंथो की रचना कर हवन और यज्ञो का विकास कर रहे थे| यज्ञो के विकास से उनकी आमदनी और प्रभाव में वृद्धि हो रही थी| किन्तु आर्यो-अनार्यों के इस संयुक्त मिश्रित समाज में ध्यान और समाधी के अध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले संतो, साधु-सन्यासियों और श्रमणों की काफी संख्या थी| बहुत बड़ी मात्रा में लोग समाज में गृहस्थी जीवन की उपेक्षा कर साधु-सन्यासी बन रहे थे, यहाँ तक कि ध्रुव, प्रह्लाद और नचिकेता जैसे बाल वैरागी और सन्यासियों के उदहारण हैं| इन परिस्थितियों में ब्राह्मण व्यवस्थाकारो ने आश्रम व्यवस्था का निर्माण किया| व्यक्ति के जीवन को आयु के अनुसार चार चरणों में बाटा गया- ब्रह्मचर्य (0- 25 वर्ष), गृहस्थ (25-50 वर्ष), वानप्रस्थ (50-75 वर्ष) और सन्यास (75-100 वर्ष)| गृहस्थ आश्रम को शीर्ष महत्ता प्रदान की गई| धर्मशास्त्रो ने गृहस्थ आश्रम को महाश्रम कहा हैं, जिसमे व्यक्ति से 'वर्णाश्रम' अनुसार ''अर्थ और 'काम' के पुरुषार्थो को प्राप्त करते हुए सभी हवन और यज्ञ करने की अपेक्षा की जाती थी| आश्रम व्यवस्था में 'ध्यान और समाधी' के माध्यम से 'मोक्ष' प्राप्ति हेतु वानप्रस्थ और सन्यास को व्यक्ति के जीवन में स्थान तो प्रदान किया गया, किन्तु उनको जीवन के बाद के काल में क्रमश 50 और 75 की आयु पर रखा गया हैं|

छठी शताब्दी ईसा पूर्व (600 ईसा पूर्व) में भारत में बौधिक क्रांति हुई जिसका नेतृत्व क्षत्रियों ने किया| लोगो ने ब्राह्मणों की श्रेष्ठता, वेदों को सर्वोच्त्ता और यज्ञों की उपयोगिता पर प्रश्न उठाये गए और इनका विरोध किया गया| क्षत्रियों ने ज्ञान और शिक्षा के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ दिया| पांचाल नरेश प्रवाहण जैबलि, केकय-शासक अश्वपति, विदेह नृप जनक, काशी नरेश अजातशत्रु ने अनेक ब्राह्मणों को भी शिक्षा दी थी| इनके अतिरिक्त प्रतर्दन, चित्र गांगायिन, जनश्रुति पौत्रायण और बृहद्रथ आदि अनेक क्षत्रिय शासक थे जो दर्शन और मीमांसा में प्रवीण थे|

हिंदू धर्म में यह उपनिषदों का रचना काल हैं| उपनिषदों की रचना मुख्यतः क्षत्रियों ने की थी| उपनिषदों में भी वेदों की सर्वोच्त्ता और यज्ञों की उपयोगिता पर प्रश्न उठाये गए और इनका विरोध किया गया| उपनिषदों में आत्मा, परमात्मा, कर्म, पुनर्ज़न्म और मोक्ष आदि विषयो पर लिखा गया हैं| भारत में एक बार फिर ध्यान और समाधी के अध्यात्मिक मार्ग बल दिया जान लगा| भारत में लगभग 60 नए संप्रदाय चले| जिनमे बौद्ध और जैन धर्म आम जानता में काफी लोकप्रिय हुए| बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुध (563- 483 ईसा पूर्व) और और जैन धर्म के अंतिम तीर्थकर वर्धमान महवीर(540- 468 ईसा पूर्व) दोनों क्षत्रिय थे| दोनों धर्मो में ध्यान का विशेष महत्व हैं| कालांतर में बौद्ध धर्म तो पूरे एशिया में फ़ैल गया तथा मध्य एशिया, चीन, जापान, कोरिया, दक्षिण पूर्व एशिया, श्री लंका आदि में ध्यान समाधी का अध्यात्मिक मार्ग स्थापित और प्रतिष्ठित हुआ| इसी कारण से बुद्ध को एशिया का प्रकाश लाईट ऑफ एशिया कहा जाता हैं| बुद्ध के धर्म के माध्यम से ध्यान और समाधी के अध्यात्मिक मार्ग ने दुनिया के बहुत बड़े भाग में प्रभाव कायम किया|

जैन और बुद्ध धर्म भारत में प्रागैतिहासिक काल से प्रचलित ध्यान और समाधी की शैव परम्परा से प्रभावित थे| कुछ इतिहासकारों के अनुसार जैन धर्म के पहले तीर्थकर ऋषभदेव और शिव एक ही व्यक्ति माने जाते हैं| दोनो के वर्णन में अनेक समानताये हैं| कैलाश मानसरोवर दोनों के इतिहास से जुड़ा हुआ हैं| शैव साहित्य में कैलाश मानसरोवर शिव का निवास माना जाता हैं तथा जैन साहित्य में ऋषभदेव का कैवल्य मोक्ष प्राप्ति का स्थान| शिव का वाहन वृष हैं तो ऋषभदेव का चिन्ह भी वृष हैं| शिव को पशुपति कहा जाता हैं, शतपथ ब्राह्मण में ऋषभदेव को भी पशुपति कहा गया हैं| अतः ध्यान समाधि के मार्ग पर चलने वाले जैन और शैव संप्रदायो का इतिहास एक ही व्यक्ति शिव/ ऋषभदेव तक जाता हैं|

ध्यान और समाधी के मार्ग की समानता के कारण इससे अभिन्न रूप से जुड़े शिव को बोद्ध धर्म में भी स्वीकार किया गया| त्रिपिटक में निर्वाण मोक्ष के लिए 'शिवम' शब्द का प्रयोग किया गया हैं| महायान शाखा के बोद्ध ग्रन्थ सद् धर्म पुण्डरीक सूत्र में शिव की उत्पत्ति अवलोकितेश्वर बोधिसत्व से बताई गयी हैं| यह भी कहा गया हैं कि अवलोकितेश्वर शिव के रूप में धर्म की शिक्षा देते हैं| बोद्ध ग्रंथो में यह भी कहा गया हैं कि शिव भविष्य में भस्मेश्वर बुद्ध के तौर पर बुद्धत्व प्राप्त करगे| एलिफेंटा की गुफाओ में ध्यानस्थ शिव की मूर्तिया उस काल में बनी बुद्ध की ध्यानस्थ मूर्तियों से समानता रखती हैं|

प्राचीन काल में शक और कुषाण कबीले प्रकाश के देवता मिहिर सूर्य के उपासक थे| कालांतर में ये बौध धर्म के प्रभाव में आ गए क्योकि यहाँ बोधिसत्व वैरोचन (Celestial Buddha) प्रकाश के देवता के रूप में उपलब्ध थे| उन्होंने वैरोचन बुद्ध को प्रकाश के देवता के रूप में अपनाया जोकि उनके पूर्व के धार्मिक विश्वास से मेल खाता था|

वैरोचन बुद्ध और शिव में भी समानता हैं| जिसके कारण बाद में शक, कुषाण और हूण शैव धर्म की और झुक गए| जावा में लिखे गए कुंजरकर्ण नामक बौद्ध धर्म के ग्रन्थ में वैरोचन को बुद्ध और शिव दोनों के रूप में प्रदर्शित किया गया हैं| इस ग्रन्थ में स्वयं वैरोचन कहते हैं कि वो शिव और बुद्ध दोनों का रूप हैं| इस ग्रन्थ में वैरोचन बुद्ध और शिव एक ही सर्वोच्च सिद्धांत की अभिव्यक्ति माने गए हैं| तिब्बती तांत्रिक बौद्ध धर्म में वैरोचन और शिव एक ही माने जाते हैं|

बौद्ध और जैन धर्म के लगभग साथ-२ भागवत संप्रदाय का उत्कर्ष हुआ| जिसके आराध्य देव कृष्ण हैं, जिन्होने महाभारत में गीता का उपदेश दिया| गीता में आत्मा परमात्मा के योग और मोक्ष के विषय में बताया गया हैं| गीता के अनुसार कृष्ण का ज़न्म विष्णी कुल में हुआ था, जोकि ऋग्वैदिक अनार्य कबीले विषाणिन् से साम्य रखता हैं| हिंदू धर्म में यदि शिव योग की प्रतिमूर्ति हैं तो गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण योग के सबसे बड़े प्रवक्ता हैं| कृष्ण को मोक्षदाता कहा जाता हैं और योगेश्वर के रूप में उनकी ख्याति हैं| कृष्ण शिव भक्त थे, वे कहते थे कि वो शिव के कार्य को ही आगे बढ़ा रहे हैं| कृष्ण ने ध्यान समाधी के मार्ग में भक्ति का समावेश कर दिया| उन्होंने कृष्ण भक्ति और उसके फलस्वरूप प्राप्त प्रसाद कृपा को ध्यान समाधी के अध्यात्मिक मार्ग में सफलता के लिए श्रेष्ठ बताया हैं|

बादरायण द्वारा लिखित ब्रह्म सूत्र ध्यान-समाधी के मोक्ष मार्ग का विषद वर्णन और समर्थन करता हैं|

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मह्रिषी पतंजलि ने व्याकरण ग्रन्थ महाभाष्य में भागवतो और विष्णु के अवतार के रूप वासुदेव कृष्ण का उल्लेख किया हैं| पतंजलि ने योग सूत्र ग्रन्थ भी लिखा था| इस ग्रन्थ में आत्मा-परमात्मा के योग और मोक्ष के लिए ध्यान और समाधी के मार्ग की पुष्ठी की गयी हैं|

आठवी शताब्दी के आरभ में भारत पर हुए अरब आक्रमण ने देश के लिए संकट उत्पन्न कर दिया| उज्जैन के गुर्जर प्रतिहार शासक नाग भट ने देश की रक्षा की तथा उत्तर भारत में एक नवीन साम्राज्य की नीव रखी| आठवी से लेकर दसवी शताब्दी तक उत्तर भारत में गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य विद्यमान रहा तथा तथा इस वंश के मिहिर भोज आदि सम्राटो ने उत्तर भारत के धर्म और संस्कृति की अरब साम्राज्यवाद से रक्षा की| अरबी यात्री सुलेमान गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा शत्रु कहा हैं| समय की मांग को देखते हुए मेधातिथि ने 'देवल स्मृति' में दूसरे धर्म में चले गए लोगो के लिए दोबारा हिंदू धर्म में लाने के विधान का निर्माण किया| इस काल में भारत में पौराणिक हिंदू धर्म का उभार हो रहा था| गुर्जर- प्रतिहारो और उनके चंदेल, परमार, चौहान, तंवर, गहलोत आदि सामंतो ने पौराणिक हिंदू धर्म का समर्थन किया तथा उत्तर भारत में अनेक पौराणिक देवी-देवताओ के मंदिर बनवाए| इस काल में वैदिक हवन-यज़ और साधु-सन्यासियों का ध्यान-समाधी का अध्यात्मिक मार्ग समाज में पहले जैसे लोकप्रिय नहीं रहे| गुर्जर-प्रतिहार काल में मंदिर जाकर पौराणिक देवी-देवताओ की पूजा-अर्चना करने की परंपरा विकसित हुई, जोकि आज भी आधुनिक हिंदू धर्म की मुख्य पूजा पद्धति हैं| हालाकि इसी काल में आदि शंकराचार्य जी ने ब्रह्म सूत्रपर टीका लिखा तथा उन्होंने उपनिषदों के दर्शन पर आधारित 'अद्वैतवाद' मत का प्रतिपादन किया| आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता हैं| आदि शंकराचार्य ने ध्यान-समाधि के मार्ग और सन्यासी जीवन का समर्थन किया| उनकी शिक्षाए बौद्ध धर्म से इस कदर मिलती थी कि उन्हें 'प्रछन्न बुद्ध' भी कहा जाता हैं|

मध्य काल में गुरु गोरखनाथ ने योग की विधा को व्यवस्थित और संगठित किया| हिन्दू परम्पराओ में गुरु गोरखनाथ को महायोगी माना जाता हैं| वे शिव के अवतार माने जाते हैं| इनके अनुयाई गोरखनाथी तथा योगी कहलाए| इनमे से कुछ आज पूरे भारत में जोगी जाति के रूप में भी पाए जाते हैं| वास्तव में जोगी शब्द योगी का अपभ्रंश हैं| यह जाति शिव की उपासक हैं| ये लोग रोजाना योगिक क्रियाए करते हैं| उत्तर प्रदेश का गोरखपुर नगर और वहा स्थित गोरखनाथ मठ गुरु गोरखनाथ के नाम पर ही जाने जाते हैं| योगी आदित्यनाथ जी गोरखनाथ मठ के महंत हैं तथा गुरु गोरखनाथ की योग परंपरा के ध्वज वाहक हैं| उनके व्यक्तित्व और विचारो में योग साधना का ओज स्पष्ट झलकता हैं| भारत के अतिरिक्त गुरु गोरखनाथ का नेपाल में काफी प्रभाव रहा हैं| नेपाल का ऐतिहासिक गोरखा जिला तथा गोरखा जाति का नाम भी गुरु गोरखनाथ के नाम पर ही पड़ा हैं|

आधुनिक काल में पूरे विश्व में भारतीय अध्यात्म का परचम फहराने वाले स्वामी विवेकानंद, आचार्य रजनीश आदि सभी ध्यान और समाधी के मार्ग के प्रवक्ता और समर्थक हैं|


आज भारत में अनेक धर्म गुरु लोकप्रिय हैं| इनमे अधिकांश ध्यान साधना के समर्थक हैं| हवन-यज़ अथवा पौराणिक देवी-देवताओ की पूजा अर्चना इनके शिविरों में कम ही देखने को मिलती हैं| कुछ समय पूर्व 'दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान' के संथापक 'आशुतोष महाराज जी' के समाधी में जाने के समाचार आधनिक मीडिया में छाया रहा| जिस कारण से ध्यान और समाधी का मार्ग एक बार फिर चर्चा और विश्लेषण का विषय बन गया था| दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने आशुतोष महाराज जी के शरीर को सुरक्षित रखा हुआ हैं| संस्थान और आशुतोष महाराज जी के शिष्यों को उम्मीद और विश्वास हैं की वे एक दिन अवश्य समाधी से बाहर आयेंगे|

वर्तमान में स्वामी रामदेव जी एवं आचार्य कर्मवीर जी ने विभिन्न रोगों से पीड़ित मानवता के उद्धार लिए योगिक क्रियाओ के उपयोग को अपने योग शिविरों के माध्यम से अत्यंत लोकप्रिय बना दिया हैं| आरोग्यता, सोहार्द एवं शांति हेतु योग की महत्ता को समूर्ण विश्व ने स्वीकार कर लिया हैं तथा इस क्रम में सयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को अन्तराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया हैं|

(Dr Sushil Bhati)

Thursday, May 15, 2014

शिव पुराण की उमा संहिता में दिए गए काल को जीतने के उपाय

नवधा शब्दब्रह्म एव तुंकार

भगवान शिव माँ पार्वती जी को बताते हैं- रात में जब सब सो जाये अंधकार में योग धारण करे| तर्जनी उंगली से दोनों कानो को बंद करके दो घडी तक दबाए रखे| इस अवस्था में अग्नि प्रेरित शब्द सुनाई देता हैं| योगाभ्यास द्वारा सुनने के प्रयत्न पर भी जब योगी इस शब्द को नहीं सुन पाता, तब भी वह दिन रात अभ्यास में लगा रहे| ऐसा करने से सात दिन में वह शब्द प्रकट होता हैं, जो मृत्यु को जीतने वाला हैं|
यह शब्दब्रह्म न ओंकार हैं, न मन्त्र हैं, न बीज हैं, न अक्षर हैं| यह अनाहत (बिना आघात के अथवा बिना बजाये ही प्रकट होने वाला शब्द) हैं| इसका उच्चारण किये बिना ही चिंतन होता हैं| इस शब्द- जैसे आकाश में वर्षा से युक्त बादल गरजता हैं को सुनकर योगी तत्काल संसार बंधन से छूट जाता हैं| तदन्तर योगियों द्वारा प्रतिदिन इस शब्द के चिंतन करने से यह सूक्ष्म से सूक्ष्मतर हो जाता हैं|

शब्दब्रह्म नो प्रकार के हैं
  1. घोष- सबसे पहले घोषात्मक नाद प्रकट होता हैं, जो आत्म शुद्धि का उत्तम साधन हैं| यह उत्तम नाद सब रोगों को हर लेने वाला तथा मन को वशीभूत कर अपनी ओर खीचने वाला हैं|
  2. कास्य नाद- दूसरा नाद कास्य नाद हैं, जो प्राणियों की गति को स्थम्भित करता हैं| यह विष, भूत, और ग्रह आदि सबको को बांधता हैं|
  3. श्रृंग नाद- यह अभिचार से सम्बन्ध रखने वाला हैं|
  4. घंटा नाद- चौथा नाद घंटा नाद हैं जिसका उच्चारण साक्षात् शिव करते हैं| यह नाद सम्पूर्ण देवताओं को भी आकृष्ट कर लेता हैं, फिर भूतल के मनुष्यों की तो बात  ही क्या हैं|
  5. वीणा- पांचवा नाद वीणा नाद हैं जिससे दूरदर्शन की शक्ति प्राप्त होती हैं|
  6. वंशी नाद- इस नाद का ध्यान करने वाले योगी को सम्पूर्ण तत्व प्राप्त हो जाता हैं|
  7. दुन्दुभी नाद- इस नाद का चिंतन करने वाला साधक ज़रा और मृत्यु के कष्ट से छूट जाता हैं|
  8. शंख नाद- शंख नाद का अनुसन्धान होने पर इच्छा अनुसार रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती हैं|
  9. मेघ नाद- के चिंतन से योगी को कभी विपत्ति का सामना नहीं करना पड़ता |

भगवान शिव कहते हैं कि इन नो शब्दों के चिंतन से बढ़कर कर तुंकार का अभ्यास हैं | शिव पार्वति माँ को बताते हैं कि प्रतिदिन एकाग्रचित से ब्रह्मरुपी तुंकार का ध्यान करते हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं होता हैं| उसे मनोवांछित सिद्धि प्राप्त हो जाती हैं| वह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होकर सर्वत्र विचरण करता हैं, कभी विकारों के वशीभूत नहीं होता| वह साक्षात शिव ही हैं, इसमें संशय नहीं हैं|
             

 हर....हर ....महादेव!!!!!  हर ..हर ...महादेव!!!!!!!!!! 

शिव पुराण की उमा संहिता में मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए बताई गयी चार योगिक साधनाए


1. प्राणायाम- भगवान शिव माँ पार्वती को मृत्यु को जीत कर अमरत्व प्राप्त करने के लिए  चार योगिक साधनाओ के बारे में बताते हुए, सबसे पहले, वे प्राणायाम का महत्व समझाते हैं| वे कहते हैं कि साधक जरा और मृत्यु को जीतने कि इच्छा से सदा धारणा में स्थित रहे, क्योकि योगपरायण योगी को भली-भाति धारणा और ध्यान में तत्पर रहना चाहिए| जैसे लुहार मुख से धोकनी को फूक-फूक कर, वायु के द्वारा अपने सब कार्यों को सिद्ध करता हैं, उसी प्रकार योगी को अपने कार्य सिद्धि के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए| प्राणयाम के समय जिन परमेश्वर का ध्यान किया जाता हैं वे समस्त ग्रंथियो को आवृत करके उनसे दस अंगुल आगे स्थित हैं| आदि में व्याह्व्ती और अंत में शिरो मन्त्र सहित गायत्री का तीन बार जप करे और प्राण वायु को रोके रहे| प्राणों के इस आयाम का नाम प्राणायाम हैं|

2. भ्रूमध्य में अग्नि का ध्यान- भगवान शिव माँ पार्वती को यह बताने के बाद कि योगी किस प्रकार वायु (प्राणायाम) से सिद्धि प्राप्त करता हैं, आगे बताते हैं कि योगी किस प्रकार तेज से सिद्धि लाभ करता हैं| भगवान शिव कहते हैं कि जहा दूसरे लोगो की बातचीत का कोलाहल न पहुँचता हो, ऐसे शांत-एकांत स्थान में अपने सुखद आसान पर बैठकर, वाम और दक्षिण नेत्र की कांति से प्रकाशित भ्रूमध्य भाग में, जो अग्नि का तेज अव्यक्त रूप प्रकाशित होता हैं, उसे आलस्यरहित योगी दीपकरहित अंधकारपूर्ण स्थान में चिंतन करने पर निश्चय ही देख सकता हैं- इसमें संशय नहीं हैं| योगी हाथ कि उंगलियों से यत्नपूर्वक दोनों नेत्रो को कुछ-कुछ दबाए रखे और उनके तारों को देखता हुआ, एकाग्रचित से आधे मुहुर्त तक उन्ही का चिंतन करे| तदन्तर अन्धकार में भी ध्यान करने पर वह इस ईश्वरीय प्रकाश को देख सकता हैं| यह ज्योति सफ़ेद, लाल, पीली, काली तथा इन्द्रधनुष के सामान रंगवाली होती हैं| जो अन्धकार से परे और सूर्य के सामान तेजस्वी हैं, उसी महान ज्योतिर्मय पुरुष (परमात्मा) को जानकार मनुष्य काल या मृत्यु को लांघ जाता हैं| मोक्ष के लिए इसके सिवा कोई अन्य मार्ग नहीं हैं|

3. मुख से वायुपान- भगवान शिव माँ पार्वती को आगे बताते हैं कि योगी अपने चित को वश में करके, यथायोग्य स्थान में सुखद आसान पर बैठे| वह शरीर को ऊँचा करके, अंजलि बांधकर चोंच जैसी आकृति वाले मुख के द्वारा धीरे-धीरे वायु का पान करे| ऐसा करने से एक पल में तालू के भीतर स्थित जीवनदायी जल कि बूंदे टपकने लगती हैं| उन बूंदों को वायु के द्वारा लेकर सूंघे| वह शीतल जल अमृत स्वरुप हैं| जो योगी प्रतिदिन उसे पीता हैं, वह कभी मृत्यु के अधीन नहीं होता| उसे भूख-प्यास नहीं लगती| उसका शरीर दिव्य और तेज महान हो जाता हैं| वह बल में हाथी और वेग में घोड़े की समानता करता हैं| उसकी दृष्टि गरुड़ के सामान तेज हो जाती हैं और उसे दूर कि बाते सुनाई देने लगती हैं| उसके केश काले-काले और घुंघराले हो जाते हैं|

4. जिव्हा द्वारा गले घाटी का स्पर्श- भगवान शिव आगे बताते हैं कि योगी पुरुष अपनी जिव्हा को मोड कर तालू में लगाने का प्रयत्न करे| कुछ काल तक ऐसा करने से यह क्रमश लंबी होकर गले कि घाटी तक पहुच जाती हैं| तदन्तर जब जिव्हा गले की घाटी से सटती हैं, तब शीतल सुधा का स्त्राव करती हैं| उस सुधा को जो योगी सदा पीता हैं, वह अमरत्व को प्राप्त होता हैं|


हर हर महादेव !!!  हर हर महादेव !!!!!!   हर हर  महादेव !!!!!!!!!!!

Wednesday, May 14, 2014

दुनिया का अस्तित्व एक रहस्य हैं?

डा. सुशील भाटी 

दुनिया का अस्तित्व एक रहस्य हैं? दुनिया क्या हैं? जीवन क्या हैं? इस जीवन के पहले क्या था और बाद में क्या होगा? इस अनंत ब्रह्माण्ड का क्या कोई ओर-छोर हैं या नहीं? यदि कोई छोर हैं तो उसके बाद क्या हैं? इस ब्रह्माण्ड के अस्तित्व में आने से पहले क्या था और यदि कभी इसका अंत हुआ तो इसके स्थान पर क्या होगा?

दुनिया में ज़न्मे कुछ लोग सहज रूप से ही दुनिया के इस रहस्य की ओर आकर्षित होते हैं| वो पूर्ण सत्य को जानने के लिए जिज्ञासु रहते हैं| ऐसे मनुष्य वास्तविक अध्यात्मिक व्यक्ति होते हैं| ये जीवन-पर्यंत सत्य का अनुष्ठान करते हैं| ध्रुव, प्रह्लाद, नचिकेता, संत ज्ञानेश्वर, स्वामी विवेकानंद आदि साधु-संत ऐसे ही सत्य प्रेमी हैं| अपनी सत्य निष्ठा के कारण प्राकृतिक-सामाजिक वैज्ञानिक अक्सर आध्यात्म के निकट होते हैं, जैसे- प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन| विज्ञानं ओर आध्यात्म में कोई विरोधाभास नहीं हैं, बल्कि आध्यात्म अक्सर विज्ञानं के लिए कुछ अग्रिम संकल्पनाए प्रस्तुत करता हैं, जिनकी पुष्ठी कई बार विज्ञानं अपने शोध द्वारा करता हैं|

आम आदमी आनंद की खोज में रोज-मर्रा के जनजीवन में उलझा रहता हैं ओर उसका ध्यान बहुधा दुनिया के इस रहस्य की तरफ नहीं जाता| दुनिया के दुःख-कष्ट कई बार रोज-मर्रा के जीवन से उसका मोह भंग कर देते हैं ओर कुछ पलों के लिए वह दुनिया ओर जीवन पर पुनर्विचार करता हैं ओर रहस्य के परे पूर्ण सत्य की तरफ आकर्षित होता हैं| ऐसा करके वह दुखो से मुक्त महसूस करता हैं| किसी प्रिय की मौत, सबसे बड़े दुखो में से एक हैं| अतः शमशान में अक्सर ऐसे अनुभव होते हैं| दुनिया के प्रमुख धर्म- हिंदू, इस्लाम, सिक्ख, ईसाई आदि ईश्वर ओर उसकी सत्ता को पूर्ण सत्य मानते हैं| अतः कष्ट ओर दुःख के समय मानव ईश्वर को याद करता हैं| लेकिन दुनिया के सभी धर्म ईश्वरीय सत्ता को नहीं स्वीकारते, जैसे बौद्ध धर्म| बौद्ध धर्म का ज़न्म ही मानव के दुःख निरोध के लिए हुआ हैं| बौद्ध धर्म ने दुःख निरोध के लिए आस्टान्गिक मार्ग बताया हैं, जिसमे चरम पर समाधी हैं|

चाहे मनुष्य सहज जिज्ञासु हो अथवा उसका मकसद दुःख-निरोद्ध हो सत्य की खोज के मार्ग पर चलना ओर सत्य का अनुभव करना आसान कार्य नहीं हैं| जिसके प्रमुख रूप से दो कारण हैं| पहला कारण यह हैं कि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों की सीमाएँ हैं| आंखें प्रकाश की एक सीमा के अंदर ही देख सकती हैं| कान 20 से 20000 हर्ट्ज (Hz) तक की आवाज़ को ही सुन सकते हैं| इसी प्रकार मनुष्य के सूघने, चखने और छू  कर महसूस करने की अपनी सीमाए हैं| इसीलिए मनुष्य की सभी परिकल्पनाए, विचार और उसका सारा ज्ञान-विज्ञानं अर्ध सत्य और सीमित हैं और पूर्ण सत्य इन सीमाओ के बाहर हैं|

दूसरा कारण यह हैं की मनुष्य दुनिया की हर चीज़ को अपनी मूलभूत आवश्कताओ (Basic needs) की पूर्ती के लिए देखता-समझता हैं| भूख, प्यास, सेक्स, शरीर का मौसम से बचाव और जीवन की सुरक्षा आदि उसकी मूलभूत आवश्कता हैं| दूसरे शब्दों मनुष्य रोटी, कपडा और मकान के सन्दर्भ में ही दुनिया को देखता-समझता हैं| वह प्रकृति को उसके वास्तविक रूप में नहीं देखता बल्कि उसमे अपने भोग की वस्तुओ को ही तलाशता हैं|  मसलन मनुष्य को किसी झाडी में, उसका वास्तविक स्वरुप कम, बल्कि उसे पुशुओ का चारा या चूल्हे का ईधन अधिक दिखाई देता हैं|

प्रश्न उठता हैं कि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियो की सीमाओ ओर रोज-मर्रा के भोग-विलासो में उलझे हुए उसके मन के बावजूद, क्या पूर्ण सत्य को जाना जा सकता हैं या नहीं?

हिन्दुस्तान में सत्य को जानने के लिए ध्यान ओर समाधी का मार्ग अति प्राचीन काल से प्रचलित हैं| हिंदू, बौद्ध, जैन आदि सभी ध्यान ओर समाधी की अवस्था में सत्य के साक्षात्कार ओर आनंद प्राप्ति की बात करते हैं| मनुष्य इस मार्ग पर अपने को समर्पित कर सके इसके लिए सभी हिन्दुस्तानी मूल के धर्म भोग-विलासो पर नियंत्रण और अनुशासित जीवन की बात भी करते हैं|

ध्यान और समाधी के मार्ग की सत्यता और अधिकारिता, इस मार्ग पर चल कर ही पता चल सकती हैं? समुन्द्र के किनारे बैठ कर उसकी उसकी हकीकत नहीं जानी जा सकती| उसे जानने के लिए तो समुन्द्र में छलांग लगानी ही पड़ेगी|

                                                                                                        - Dr. Sushil Bhati